आसान नहीं होता किसी भी इनसान के जीवन को परदे पर उतारना. उसके संघर्ष और जीवन को उसी तरह दिखाने के लिए काफी मेहनत और तैयारी की जरूरत रहती है. इसके लिए मेहनत और समय तो देना ही पड़ता है. इसके बिना मनमाफिक नतीजे नहीं मिलने का खतरा रहता है. मुझे लगता है कि जिंदगी में हमें जो कुछ मिलता है, हम उसे ही लौटाते हैं. मैं दिल्ली के एयरफोर्स बाल भारती स्कूल में पढ़ता था. हमारे कैंपस में एक मिग विमान खड़ा था. हम उसी के नीचे बैठते और खेलते थे. जब मैं रंग दे बसंती बनाने लगा तो इस फैक्टर ने काफी काम किया. मिग की याद मेरे जेहन में थी और मिग हादसों ने इस टॉपिक को फिल्म में डालने के लिए प्रेरित किया. बायोपिक बनाते समय इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि वह ऑडियंस के साथ कनेक्ट भी कर सके. रंग दे बसंती बायोपिक नहीं थी, लेकिन फिल्म ऐतिहासिक पात्रों से जुड़ी हुई थी. शुरू में हम इसे यंग गन्स ऑफ इंडिया के नाम से बनाना चाहते थे. जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर की जिंदगी दिखाई जानी थी. लेकिन जब हमने 2002 में इस फिल्म को लेकर दिल्ली और मुंबई में कई कॉलेजों के छात्रों से बात की तो वे कुछ देर में ही बोर होते नजर आए. मजेदार यह कि कुछ बच्चों ने चंद्रशेखर आजाद को कीर्ति आजाद का ग्रैंड फादर तक बता दिया, वहीं कइयों ने कहा कि अगर भगत सिंह और राजगुरु आज होते तो इंडियन आर्मी में होते. ये सारे फैक्टर्स हमारे लिए महत्वपूर्ण थे. हमने कहानी को इन लड़कों के जरिए कहने का फैसला किया जो तीन देशभक्तों का किरदार निभाते हैं और असल जिंदगी में भी वैसे ही हो जाते हैं. इस तरह से टॉपिक यूथ से कनेक्ट कर गया. लेकिन इसके लिए मुझे उस दौर और भगत सिंह से जुड़े लेख पढऩे पढ़े. इसी तरह जब मैं फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह परभाग मिल्खा भाग बना रहा था, तो यह कहानी हिंदुस्तान के बंटवारे से जुड़ी हुई थी. लेकिन उस समय और मिल्खा के बारे में मैं ज्यादा जानता नहीं था. इसके लिए मैंने ब्रिटेन के मूवीटोन जाकर सात से आठ दिन तक रिसर्च की. वहां मैंने मिल्खा सिंह से जुड़े वीडियो देखे और कई मैग्जीन्स के जरिए उनके बारे में जाना. उसी दौरान एक आर्टिकल मेरे हाथ लगा जिसमें एक लेडी डॉक्टर ने दिल्ली के पुराने किले के रिफ्यूजी कैंप का जिक्र किया था. उसने बताया था कि वहां पेड़ों पर एक पत्ता तक नहीं रह गया था. लोग इतने भूखे थे कि वे सब खा गए थे. इसी से मुझे फिल्म के अपने सीन का आइडिया मिला. वैसे मिल्खा सिंह का भी हमें काफी सपोर्ट मिला. वे काफी समय हमारे साथ थे. यानी इस मामले में प्राइमरी सोर्स का भरपूर फायदा मिला. लेकिन कई मामलों में हमें दूसरे स्रोतों का भी सहारा लेना पड़ता है. अब मैं मिर्जिया बना रहा हूं. यह एक लोककथा पर आधारित है लेकिन इसके लिए भी खूब रिसर्च करनी पड़ी है. जमाना बदल रहा है. हम हमेशा एक ही चीज और तेवर को साथ लेकर नहीं चल सकते. इसी तरह फिल्ममेकिंग के बारे में है. हर बार कुछ नया देना होता है और कहानी को दिलचस्प अंदाज में कहना होता है. लेखक फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं
Wednesday, 15 April 2015
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आसान नहीं होता किसी भी इनसान के जीवन को परदे पर उतारना. उसके संघर्ष और जीवन को उसी तरह दिखाने के लिए काफी मेहनत और तैयारी की जरूरत रहती है. इसके लिए मेहनत और समय तो देना ही पड़ता है. इसके बिना मनमाफिक नतीजे नहीं मिलने का खतरा रहता है. मुझे लगता है कि जिंदगी में हमें जो कुछ मिलता है, हम उसे ही लौटाते हैं. मैं दिल्ली के एयरफोर्स बाल भारती स्कूल में पढ़ता था. हमारे कैंपस में एक मिग विमान खड़ा था. हम उसी के नीचे बैठते और खेलते थे. जब मैं रंग दे बसंती बनाने लगा तो इस फैक्टर ने काफी काम किया. मिग की याद मेरे जेहन में थी और मिग हादसों ने इस टॉपिक को फिल्म में डालने के लिए प्रेरित किया. बायोपिक बनाते समय इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि वह ऑडियंस के साथ कनेक्ट भी कर सके. रंग दे बसंती बायोपिक नहीं थी, लेकिन फिल्म ऐतिहासिक पात्रों से जुड़ी हुई थी. शुरू में हम इसे यंग गन्स ऑफ इंडिया के नाम से बनाना चाहते थे. जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर की जिंदगी दिखाई जानी थी. लेकिन जब हमने 2002 में इस फिल्म को लेकर दिल्ली और मुंबई में कई कॉलेजों के छात्रों से बात की तो वे कुछ देर में ही बोर होते नजर आए. मजेदार यह कि कुछ बच्चों ने चंद्रशेखर आजाद को कीर्ति आजाद का ग्रैंड फादर तक बता दिया, वहीं कइयों ने कहा कि अगर भगत सिंह और राजगुरु आज होते तो इंडियन आर्मी में होते. ये सारे फैक्टर्स हमारे लिए महत्वपूर्ण थे. हमने कहानी को इन लड़कों के जरिए कहने का फैसला किया जो तीन देशभक्तों का किरदार निभाते हैं और असल जिंदगी में भी वैसे ही हो जाते हैं. इस तरह से टॉपिक यूथ से कनेक्ट कर गया. लेकिन इसके लिए मुझे उस दौर और भगत सिंह से जुड़े लेख पढऩे पढ़े. इसी तरह जब मैं फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह परभाग मिल्खा भाग बना रहा था, तो यह कहानी हिंदुस्तान के बंटवारे से जुड़ी हुई थी. लेकिन उस समय और मिल्खा के बारे में मैं ज्यादा जानता नहीं था. इसके लिए मैंने ब्रिटेन के मूवीटोन जाकर सात से आठ दिन तक रिसर्च की. वहां मैंने मिल्खा सिंह से जुड़े वीडियो देखे और कई मैग्जीन्स के जरिए उनके बारे में जाना. उसी दौरान एक आर्टिकल मेरे हाथ लगा जिसमें एक लेडी डॉक्टर ने दिल्ली के पुराने किले के रिफ्यूजी कैंप का जिक्र किया था. उसने बताया था कि वहां पेड़ों पर एक पत्ता तक नहीं रह गया था. लोग इतने भूखे थे कि वे सब खा गए थे. इसी से मुझे फिल्म के अपने सीन का आइडिया मिला. वैसे मिल्खा सिंह का भी हमें काफी सपोर्ट मिला. वे काफी समय हमारे साथ थे. यानी इस मामले में प्राइमरी सोर्स का भरपूर फायदा मिला. लेकिन कई मामलों में हमें दूसरे स्रोतों का भी सहारा लेना पड़ता है. अब मैं मिर्जिया बना रहा हूं. यह एक लोककथा पर आधारित है लेकिन इसके लिए भी खूब रिसर्च करनी पड़ी है. जमाना बदल रहा है. हम हमेशा एक ही चीज और तेवर को साथ लेकर नहीं चल सकते. इसी तरह फिल्ममेकिंग के बारे में है. हर बार कुछ नया देना होता है और कहानी को दिलचस्प अंदाज में कहना होता है. लेखक फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं
ऑडियंस से कनेक्ट जरूरी: राकेश ओमप्रकाश मेहरा और भी...
आसान नहीं होता किसी भी इनसान के जीवन को परदे पर उतारना. उसके संघर्ष और जीवन को उसी तरह दिखाने के लिए काफी मेहनत और तैयारी की जरूरत रहती है. इसके लिए मेहनत और समय तो देना ही पड़ता है. इसके बिना मनमाफिक नतीजे नहीं मिलने का खतरा रहता है. मुझे लगता है कि जिंदगी में हमें जो कुछ मिलता है, हम उसे ही लौटाते हैं. मैं दिल्ली के एयरफोर्स बाल भारती स्कूल में पढ़ता था. हमारे कैंपस में एक मिग विमान खड़ा था. हम उसी के नीचे बैठते और खेलते थे. जब मैं रंग दे बसंती बनाने लगा तो इस फैक्टर ने काफी काम किया. मिग की याद मेरे जेहन में थी और मिग हादसों ने इस टॉपिक को फिल्म में डालने के लिए प्रेरित किया. बायोपिक बनाते समय इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि वह ऑडियंस के साथ कनेक्ट भी कर सके. रंग दे बसंती बायोपिक नहीं थी, लेकिन फिल्म ऐतिहासिक पात्रों से जुड़ी हुई थी. शुरू में हम इसे यंग गन्स ऑफ इंडिया के नाम से बनाना चाहते थे. जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर की जिंदगी दिखाई जानी थी. लेकिन जब हमने 2002 में इस फिल्म को लेकर दिल्ली और मुंबई में कई कॉलेजों के छात्रों से बात की तो वे कुछ देर में ही बोर होते नजर आए. मजेदार यह कि कुछ बच्चों ने चंद्रशेखर आजाद को कीर्ति आजाद का ग्रैंड फादर तक बता दिया, वहीं कइयों ने कहा कि अगर भगत सिंह और राजगुरु आज होते तो इंडियन आर्मी में होते. ये सारे फैक्टर्स हमारे लिए महत्वपूर्ण थे. हमने कहानी को इन लड़कों के जरिए कहने का फैसला किया जो तीन देशभक्तों का किरदार निभाते हैं और असल जिंदगी में भी वैसे ही हो जाते हैं. इस तरह से टॉपिक यूथ से कनेक्ट कर गया. लेकिन इसके लिए मुझे उस दौर और भगत सिंह से जुड़े लेख पढऩे पढ़े. इसी तरह जब मैं फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह परभाग मिल्खा भाग बना रहा था, तो यह कहानी हिंदुस्तान के बंटवारे से जुड़ी हुई थी. लेकिन उस समय और मिल्खा के बारे में मैं ज्यादा जानता नहीं था. इसके लिए मैंने ब्रिटेन के मूवीटोन जाकर सात से आठ दिन तक रिसर्च की. वहां मैंने मिल्खा सिंह से जुड़े वीडियो देखे और कई मैग्जीन्स के जरिए उनके बारे में जाना. उसी दौरान एक आर्टिकल मेरे हाथ लगा जिसमें एक लेडी डॉक्टर ने दिल्ली के पुराने किले के रिफ्यूजी कैंप का जिक्र किया था. उसने बताया था कि वहां पेड़ों पर एक पत्ता तक नहीं रह गया था. लोग इतने भूखे थे कि वे सब खा गए थे. इसी से मुझे फिल्म के अपने सीन का आइडिया मिला. वैसे मिल्खा सिंह का भी हमें काफी सपोर्ट मिला. वे काफी समय हमारे साथ थे. यानी इस मामले में प्राइमरी सोर्स का भरपूर फायदा मिला. लेकिन कई मामलों में हमें दूसरे स्रोतों का भी सहारा लेना पड़ता है. अब मैं मिर्जिया बना रहा हूं. यह एक लोककथा पर आधारित है लेकिन इसके लिए भी खूब रिसर्च करनी पड़ी है. जमाना बदल रहा है. हम हमेशा एक ही चीज और तेवर को साथ लेकर नहीं चल सकते. इसी तरह फिल्ममेकिंग के बारे में है. हर बार कुछ नया देना होता है और कहानी को दिलचस्प अंदाज में कहना होता है. लेखक फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर हैं
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